हमार फुलारीक संस्कार

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हमार फुलारीक संस्कार

आज और दिनों के मुकाबले गीता सुबह जल्दी उठ गई।

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एक हाथ से आँख मसलते हुए अपनी दादी के कमरे में जाकर दुबारा सोने के लिए चली गयी। बूढ़ी दादी का प्यार बहुत अलग होता है माँ और पापा के मुकाबले वो बच्चों के साथ बच्चे औऱ बड़ों के साथ बड़े बन जाते हैं शायद यही उनको औरों से अलग करता है।  ‘कल शाम को बताया था ना!’ दादी ने कहा।

कुछ देर बाद बूढ़ी दादी ने कनस्तर में पानी गरम करके उसको नहलाया और ईजा रसोई में देई, अरसे और खीर बनाने लगी । दादी सरसों का तेल लगाते हुए उससे बातें करनी लगी और कुछ देर बाद दादी के साथ अपनी सहेलियों को लेकर क्यारियों फूल तोड़ने चली गयी।

हमार फुलारीक संस्कार

कल शाम जब दादी के साथ वो खेत में गयी थी तब वहाँ से पयोली और भट्याल के फूल लेकर आई थी फुलारी के लिए, और ईजा तो जंगल से बुरांश के फूल भी लेकर आई थी। सुबह के 8 बज चुके थे। ईजा ने एक दिन पहले ही  छोटी छोटी टोकरी में लाल मिट्टी से पुताई की थी और उसमें चावल के आटे से बने हुए हल्के हल्के ऐपण बनाये थे।

  ईजा ने अपने घर से 2 कटोरी चावल और 2 छोटे छोटे गुड़ के टुकड़े डाले और गीता के हाथ में 10 रूपए का नोट  थमाया और गीता 10 रुपये का नोट लेकर चहक खड़ी हुई। उसने जोर से 10 रुपये का नोट मुठ्ठी में बंद किया और शायद कुछ सोचने लगी।  ईजा से कुछ कहा नहीं लेकिन कहने को मन में बहुत कुछ था।

दादी से 20 का नोट मिला तो वो उसकी चेहरे की मासूमियत देखने लायक थी। कितने मासूम चेहरे होते हैं ना बच्चों पर उनकी चेहरे की मासूमियत पे हम अपना सब कुछ लुटाने को तैयार हो जाते हैं।  एक हाथ से नाक पोछती और एक हाथ से टोकरी सर में रखकर अपने सहेलियों के साथ पालमोर वाली पार्वती चाची के घर गयी । फूलदेई फूलदेई गाते हुए उसने जेब से फूल निकालकर देहली में डाले और घर के अन्दर चले गई।

  पार्वती चाची उसको पुचकारते हुए कहा ओइजा गीता, पार्वती चाची ने एक कटोरी में चावल उसके टोकरी में डाले और कुछ मिश्री और गुड़ भी, और एक 10 का नोट भी  हाथ में थमा दिया। गीता खुशी से चहक उठी।

और पार्वती चाची ने उसे एक अरसा दिया और दूसरे घर पदिम अम्मा के घर चली गयी वहाँ भी फूलदेई फूलदेई बोलकर उसने प्योली और बुराँश के फूल डाले और पदिम अम्मा बहुत प्यार जताती थी उसको , अम्मा ने गीता को एक कटोरी में दही और एक गुड़ का टुकड़ा देकर कहा टोकरी यहीं जमीन में रखकर पहले इसको खाओ फिर जाना और घरों में अभी पूरा दिन बचा हुआ है हँसते हुए पदिम अम्मा ने कहा ।

पदिम अम्मा के पास पैसे तो खुल्ले थे और उन्होंने भी उसको 5 रुपये का सिक्का दिया, उन्होंने कहा ठीक है आराम से जाना। अब तालमोर जाना था और उनके घर पे एक कुत्ता भी था जो बहुत तेज भौंकता था और गीता हमेशा उसको देखकर डर से कांप जाती थी। वो सहमी सहमी चली गयी।

मन ही मन गीता सोच रही थी,  गडरि बूबू तो उसको पक्का पैसे देंगे क्योंकि जब भी गडरि बुबू उनके घर आते हैं तो वो उनके चाय पिये हुए गिलास को वही धोती है और वो कहते हैं मैं तो बहुत होशियार भी हूँ। गीता जैसे आँगन में पहुँची तो उसने देखा शेरू सामने लेटा हुआ है गीता को लगा अब तो मैं जा भी नहीं पाऊँगी और 10 रुपये भी चले गये, ये सोच कर  जैसे ही लौट रही थी , जानकी अम्मा ने आवाज देते हुए कहा शेरू को मैंने जँजीर से बांध दिया है तुम आ जाओ।

गीता फटाफट एक हाथ से नाक साफ करते हुए और चावल की टोकरी सर में लेकर दौड़ते हुए उनके यहाँ चली गयी , देहली में फूल डाले  और फूलदेई फूलदेई कहा और अंदर चली गयी बूबू तो घर में थे नहीं अम्मा ने उसको चावल और गुड़ दिया और उसका मन बहुत उदास ही गयी क्योंकि उसके प्यारे गडरि बूबू घर में नहीं थे, जैसे वो घर से निकली तभी अंदर से जानकी अम्मा ने गीता को आवाज दी, पीछे मुड़कर देखा तो अम्मा बोल रही थी अरे तेरे बूबू ने 20 रुपये दिए हैं वो सुबह किसी काम से बाहर गए हैं गीता को तो जैसे यकीन ही नहीं हुआ।

वो भाग के गयी और खुशी से 20 रुपये ले लिये और टोकरी से एक गुड़ निकाला शेरू की तरफ फैंक दिया शेरू ने झट से खा लिया, आज से उसे एक नया दोस्त मिल गया,  ये देखकर वो मन ही मन मुस्कुराई। बच्चे कितने साफ होते हैं ना दिल के उनको प्यार जताने के लिए कुछ नहीं चाहिए होता है।  एक दो घरों में और जाकर उसने चावल और गुड़ लिए। घर जाकर वो टोकरी ईजा के हाथ में पकड़ाती है और भागते हुए दादी के कमरे में जाती है जहाँ दादी उसको हिसाब किताब में थोड़ी बहुत मदद करती है। गीता ये पूरे 90 रुपये हुए हैं बेटा।

गीता कुछ सोचते हुए अपना स्कूल का बैग निकाल लेती है और उसमें वो कुछ सवाल हल करने लगती है। दादी ये देखकर हैरान थी। लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं शायद उम्र के इस दौर में उनको कहाँ इतना ध्यान रह पाता है। गीता ने मन ही मन सोच रही थी अब बाँकी रुपये कहाँ से लेकर आयेगी ? ईजा अभी भी रसोई में पकवान बना रही थी और गीता को आते देख, दो पूड़ी और थोड़ा सा खीर , और अरसे रख दिये और गीता को खाने के लिये बोला।

आज वो  थोड़ी बहुत उदास हो गई थी और शाम को अपने सहेलियों के साथ खेलने भी नहीं गयी । लेकिन शाम होते होते उसकी आँखों में एक चमक आ गई जैसे ही उसे बूढ़ी दादी ने बताया उसके चाचा दिल्ली से आ रहे हैं उसने मन ही मन सोचा चाचा से एक बार कहेगी चाचा मुझे नंदा देवी के मन्दिर जाना है।

अगली सुबह वो उठकर चाचा के पास गई और चाचा को कहा  चाचा नन्दा देवी मंदिर चलते हैं पहले चाचा को लगा मजाक कर रही है चाचा ने उसकी बात टाल कर अपने काम पे लग गये। दोपहर के खाने में जब गीता ने खाने के लिए मना कर दिया तो सबको ऐसा लग जैसे उसकी तबियत सही नहीं है जबकि आज उसकी मनपसंद खाना बना था। झोई भात और पालक की टपकी।

दादा दादी के लाख कोशिशों के बाद जब वो नहीं आयी तो  चाचा समझ गये थे वो क्यों नहीं आ रही है। चाचा उठकर उसके पास गये और कहा पालमोर कि गोविंद दा की गाड़ी से सुबह जायेंगे चलो अब जल्दी से खाना खा लो आज तुम्हारा मनपसंद खाना बना है जल्दी चलो नहीं तो सब लोग खा लेंगे। 

अगली सुबह खिड़की से सिर निकाले हुए पेड़ों पीछे छोड़ते हुए जा रहे थे जैसे कह रहे हों गीता शाम तक आ जाना। गीता के दादी के चेहरे में एक मुस्कान लहरा रही थी। गीता मन ही मन सोच रही थी अगर उस दिन मैं जल्दी सो गयी होती तो दादी के सपने के बारे में पता ही नहीं चलता ।

जब दादी दादा जी को कह रही थी फुलदेई के बाद एक बार और नन्दा देवी मन्दिर के दर्शन करके आ जाते हैं। गाड़ी टेढ़े मेंडे रोड से होकर गुजर रही थी और वो मन ही मन मुस्कुराते हुए सोच रही थी कि आखिरकार उसकी जिद के आगे चाचा को झुकना ही पड़ा और दादी का सपना पूरा कर रही है। 

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