पंचेश्वर बांध: प्रकृति और संस्कृति का विनाश !

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भारतनेपाल के सीमा पर प्रस्तावित एशिया का सबसे ऊंचा बांध, काली व सरयू नदी के संगम पर बनने वाला है | जिसकी उत्पादन क्षमता लगभग 6480 मेगावाट प्रस्तावित है |

पंचेश्वर बांध: प्रकृति और संस्कृति का विनाश !
lohaghat, uttarakhand


झूलाघाट, ही वो शहर है जो इस परियोजना के  तहत डूबने वाला है जो भारत और नेपाल के बीच में  है, तथा जिसे  अंतर्राष्ट्रीय बाजार के नाम से भी जाना जाता है | यही पर तमाम छोटे – छोटे व्यापारी अपनी आजीविका कमाकर अपने बच्चों को पढ़ाते है और उनके सुनहरे भविष्य का सपना बुनते है |

यह एक ऐसा केंद्र है जहाँ दो अलग-अलग संस्कृतिया एक दूसरे से रूबरू होते है |  लोगो की यह भी शिकायत है की इन्हे अभी तक यहाँ कोई प्रशासनिक अधिकारी तक बात करने नहीं आया |

अलग-अलग संस्कृति होने के कारण भी यहां नेपाल व भारत के बीच शादी -ब्याह का रिश्ता भी अक्सर  सुनने और देखने को मिलता है, फिर सवाल मन में आता है  कि क्या यही परम्परा बांध  बनने के बाद भी जीवित रहेगी ?  दोनों देशों को जोड़ने वाली इस परंपरा को सरकार क्या उपाय खोजते है यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा |

आज मेरे इस विषय  को लिखने का मुख्य कारण यह जानना है कि क्या सच में इस बांध के निर्माण से लोगो को रोज़गार मिलेगा? क्या वे इस रोज़गार से खुश होंगे ? क्या उन्हे अपने घरो को छोड़ना पसन्द है ? क्या उन्हें अपने देवी – देवताओं को छोड़कर जाना पसंद है ?
यही  कुछ अनसुने  सवाल बहुत  समय से यहां के व्यापारियों और स्थानीय लोगो के ज़हन में है |

यहां के छोटे -छोटे  व्यापारी जो कई दशकों से यहाँ पर स्थापित होकर व्यापार कर  रहे शायद इनके सपने भी समाप्त हो जायेंगे | या फिर नये सपनों की तलाश में रोज़गार के लिए पलायन करना पड़े |

वैसे ही उत्तराखंड वर्षो से पलायन की मार झेल रहा है और यह परियोजना उसके पुराने घाव  में नमक का कार्य कर रही है जो की इसके सोशल मीडिया में  इतने चर्चित होने से  पता चल रहा |

अक्सर हर साल उत्तराखंड घूमने आने वाले पर्यटक तथा  यहाँ के प्रवासी लोग अपने छुट्टियाँ मनाने पहाड़ों की तरफ आते रहते है | जहाँ आपने लोगो को पहाड़ों की चोटियों पर या नदीयो  के किनारों पर भगवान शिव, पार्वती आदि स्थानीय देवताओं की  पूजा करते हुए देखा होगा, खासकर की कुमाऊँ में भगवती माता को पूजा जाता है, जिसे नेपाल में त्रिपुरा माता के नाम से भी पूजा जाता हैं |


सवाल यहाँ यह आता है कि क्या सरकार इन भगवानो से भी पूछ कर उनका विस्थापन कर रही है, क्योंकि लोगो से तो फिर भी पूछा जा सकता है की उनका विस्थापन किया जा रहा है |

स्थानीय लोगो व छोटे व्यापारियों का यहां तक कहना है कि सरकार ने उन्हें अभी तक कोई भी स्पष्ट चीज सामने नहीं रखी है जैसे कि वे उन्हें  कहाँ स्थापित करेगी, या उन्हें क्या मुआवजा मिलेगा ? पिछले कुछ वर्षों से यहाँ  के लोग इसी प्रकार अंधकारमय जीवन व्यतीत कर रहे है|

पंचेश्वर बांध: प्रकृति और संस्कृति का विनाश !

 
इनके के साथ बातचीत करके मुझे और मेरे दोस्तों को यही लगा कि शायद ये लोग इस विस्थापन से खुश तो नहीं है , और इस विस्थापन के डर से ये  चैन से सो भी नहीं पाते होंगे | जरा सोचिये की भला कौन अपने घर, माटी, इष्टदेव  व इस  पहाड़ी  संस्कृति को छोड़कर जाना चाहता है |

लगभग (40 )चालीस हज़ार करोड़ रुपयों की लागत से बनने वाला यह बांध न जाने कितने लोगो के जीवन को सुरक्षित करेगा और न जाने कितनो के सपनों को धूमल करेगा, यह तो इसके निर्माण के पश्चात ही पता लगेगा |


 मैं अपने इस लेख से प्रशासन और सरकार से बस यही उम्मीद और आशा करती हुं कि इन लोगो को बेहतर मुआवजा दिया जाये और बेहतर सुख-सुविधा दी जाये जिससे इनका आने कल मेहफूज़ हो  सके |

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